
12 March 2026(Gaurav Jaswal) बेंगलुरु के ‘रद्द-ए-मौलाइयत’ कार्यक्रम के बाद उठा सवाल: सूफियों को ‘राफ़ज़ी’ कहने वाला मौलाना अब सूफी कैसे?
रियाद में हिरासत के मामले पर बयानबाज़ी तेज, “सूफी पहचान” को लेकर देशभर में बहस.
भारत में इन दिनों सूफी पहचान और उसके वास्तविक स्वरूप को लेकर बहस तेज हो गई है। कुछ धार्मिक संगठनों और मौलवियों पर आरोप लग रहे हैं कि वे सूफी परंपरा की व्याख्या को लेकर लोगों के बीच भ्रम फैला रहे हैं।
हाल ही में एक पत्र के माध्यम से Muslim Students Organisation of India (MSO) ने भारत सरकार से अनुरोध किया कि Mufti Asjad Raza Khan Qadri के मामले में हस्तक्षेप किया जाए, जिन्हें Riyadh में स्थानीय प्रशासन द्वारा हिरासत में लिए जाने की खबर है। यह पत्र भारत के विदेश मंत्री S. Jaishankar को संबोधित किया गया है, जिसमें भारतीय दूतावास के माध्यम से मामले में राजनयिक सहायता देने की मांग की गई है।

इस बीच कुछ धार्मिक हलकों में यह आरोप भी लगाया जा रहा है कि कुछ बरेलवी मौलवी खुद को सूफी परंपरा से जोड़कर प्रस्तुत कर रहे हैं, जबकि आलोचकों का कहना है कि इससे सूफीवाद की मूल भावना कमजोर हो रही है। उनके अनुसार, देश के कई हिस्सों में यह प्रचार किया जा रहा है कि बरेलवी ही असली सूफी हैं, जबकि इस विषय पर अलग-अलग धार्मिक विद्वानों के बीच मतभेद मौजूद हैं।बताया जा रहा है कि हाल ही में Bengaluru में “रद्द-ए-मौलाइयत” नामक कार्यक्रम का आयोजन भी किया गया था, जिसके बाद यह बहस और तेज हो गई है। आलोचकों का कहना है कि इस तरह के कार्यक्रमों और बयानों के कारण धार्मिक समुदायों के बीच वैचारिक टकराव बढ़ सकता है।
वहीं, दूसरी ओर कुछ लोग यह भी मानते हैं कि रियाद में हिरासत के मामले को लेकर अपने नेता को “सूफी” पहचान के साथ पेश किया जा रहा है, ताकि सरकार से राजनयिक हस्तक्षेप की संभावना बढ़ सके।
धार्मिक मामलों के जानकारों का कहना है कि सूफीवाद भारत की आध्यात्मिक परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है और इसकी मूल भावना शांति, प्रेम और इंसानियत से जुड़ी है। ऐसे में इस विषय पर जिम्मेदार और संतुलित चर्चा की आवश्यकता है, ताकि किसी भी तरह की गलतफहमी या विवाद से बचा जा सके।


