
Rbh news (20Feb 2026 Gaurav jaswal )
फख्र है, मौलाई हूँ’ अभियान शुरू: ‘रद्द ए मौलाइयत’ के बीच सूफी संगठनों का शांति, अहले-बैत की मोहब्बत और भाईचारे का संदेश. डॉ सूफी राज जैन
‘फख्र है, मौलाई हूँ’ अभियान के माध्यम से सूफी संगठनों का शांतिपूर्ण संदेश.
देशभर में कुछ कट्टरपंथी समूहों द्वारा आयोजित ‘रद्द ए मौलाइयत’ बैठकों के जवाब में सूफी मुस्लिम संगठनों ने ‘फख्र है, मौलाई हूँ’ अभियान की शुरुआत की है। इस अभियान का उद्देश्य सूफी परंपरा, अहले-बैत से मोहब्बत और आपसी भाईचारे के संदेश को मजबूत करना है।
मौलाइयत की पृष्ठभूमि
मौलाइयत शब्द का संबंध हज़रत मौला अली (रज़ि.) से है, जो पैगंबर हज़रत मोहम्मद (सल्ल.) के दामाद और इस्लाम के चौथे खलीफा थे। हज़रत अली (रज़ि.) की शहादत और उसके बाद हज़रत मुआविया प्रथम के दौर में हुए राजनीतिक घटनाक्रम के कारण इस्लाम में ऐतिहासिक विभाजन हुआ, जिससे सुन्नी और शिया विचारधाराएं अस्तित्व में आईं। सूफी परंपरा हज़रत अली और अहले-बैत की मोहब्बत और आध्यात्मिक मूल्यों को विशेष महत्व देती है।
सूफी बोर्ड की प्रतिक्रिया
सूफी इस्लामिक बोर्ड के नेशनल वाईस प्रेसिडेंट डॉ. सूफी राज जैन ने कहा कि ‘रद्द ए मौलाइयत’ अभियान अनावश्यक विवाद उत्पन्न करने का प्रयास है।
उन्होंने कहा, “मौलाइ होना केवल एक पहचान नहीं, बल्कि यह पैगंबर और अहले-बैत से मोहब्बत का वादा है। यह मानवता की सेवा का संकल्प है और हमारी युवा पीढ़ी को सामाजिक बुराइयों से बचाने का माध्यम है। हमें अपनी पहचान पर गर्व है। हम सूफी संतों की शांतिपूर्ण विरासत के वारिस हैं।”
वहाबियत से जोड़ने का आरोप
सूफी संगठनों ने ‘रद्द ए मौलाइयत’ अभियान को वहाबियत से प्रेरित बताया है। उनका कहना है कि इसी विचारधारा ने इराक, अफगानिस्तान और पाकिस्तान जैसे देशों में अस्थिरता और अशांति को बढ़ावा दिया है।
सोशल मीडिया पर इस विषय को लेकर बहस तेज हो गई है। कुछ टिप्पणीकारों का कहना है कि इतिहास की गलत व्याख्या के जरिए मुस्लिम समाज में भ्रम और विभाजन पैदा करने की कोशिश की जा रही है।
“रद्द ए मौलाइयत” के सामाजिक प्रभाव को लेकर चेतावनी
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसे प्रयासों को समय रहते नहीं रोका गया, तो यह समाज में ‘फितना’ (अशांति) को जन्म दे सकता है और सामाजिक सौहार्द तथा राष्ट्रीय एकता को दीर्घकालिक नुकसान पहुंचा सकता है।
उन्होंने निष्पक्ष और पारदर्शी कानूनी जांच की मांग करते हुए कहा कि भारतीय संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है, लेकिन किसी भी प्रकार की नफरत, उकसावे या सांप्रदायिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों की अनुमति नहीं देता।


